Saturday, 4 December 2010

आई दीवाली

तो हर साल की तरह दीपावली या कहो दिवाली का त्योहार फिर से आया है. दीपावली का मतलब होता है '' रोशनी की कतारें. '' हिन्दू लोगों में इसका बहुत महत्व है. सब इसे बहुत उत्साह और उमंग से हर साल मनाते हैं. इस बार भी फिर वही धूम-धाम होगी, नयी चीजें और कपड़े खरीदे जायेंगे, लक्ष्मी पूजन होगा, अनगिन दिये जलाये जायेंगे, तरह-तरह की मिठाइयाँ खरीदना, आपस में मिलना-जुलना और साथ में खाना-पीना होगा. तो क्यों न सब बच्चों को दिवाली पर कहानी भी फिर से सुनाई जाये..क्या कहते हैं आप लोग...सुनोगे ? क्या कहा..हाँ ..तो फिर तैयार हो जाओ.

तो आप सबको पहले से ही पता है कि दिवाली का मतलब होता है '' रोशनी का त्योहार.'' प्राचीन हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से दिवाली के दिन से नये साल का आरंभ होता है और यह कार्तिक महीने में मनाई जाती है. अंग्रेजी महीने के हिसाब से ये अक्तूबर या नबम्बर में पड़ती है. ये मुख्यतया दो कारणों से मनाई जाती है : 1. माँ लक्ष्मी जी का पूजन 2. अच्छाई की बुराई पर जीत. लोग इस अवसर पर कई तरह की कहानियाँ सुनते और सुनाते हैं कि किस तरह से देवी देवताओं ने राक्षसों और असुरों को हराया था..लेकिन जो सबसे प्रसिद्ध व प्रचलित कहानी है वो सुना रही हूँ कि त्रेता युग में राम जो रानी कौशल्या व राजा दशरथ के पुत्र थे उन्हें उनकी सौतेली माँ कैकेयी ने 14 के लिये जंगल में रहने भेज दिया था क्योंकि वह नहीं चाहती थीं कि राम को राजा बनाया जाये. एक दिन लंका के राजा रावन ने सीता माता का धोखे से अपहरण कर लिया. तब राम अपने मित्र हनुमान व तमाम वानर और भालुओं की सेना के साथ लंका पहुँचे और वहाँ रावन और उसकी सेना के साथ घमासान युद्ध किया जिसमें रावन राम के हाथों छोड़ा हुआ सुनहरा तीर लगने से मारा गया. और राम व सीता वापस अयोध्या लौट आये. लेकिन उस दिन घोर अँधेरी रात थी तो अयोध्या वासियों ने अपने घरों के बाहर तमाम दिये जला कर रखे ताकि राम, लक्ष्मण और सीता जी को घर का रास्ता ढंग से दिख सके. और सारी प्रजा ने उस दिन राम के वापस आने की खुशी में नाच-गाना किया और फुलझडियाँ जला कर अपनी खुशी प्रकट की.
आज को भी दिवाली मनाने की वही प्रथा चली आ रही है. सब लोग परिवार के संग मिलकर अपने घरों में दिवाली मनाते हैं. इस दिन स्कूल व आफिस बंद रहते हैं. और आप लोग तो जानते ही हैं कि आज के दिन कैसी बढ़िया-बढ़िया स्पेशल मिठाइयाँ हलवाई लोग बनाते हैं और उन्हें खरीदने के लिये दूकानों में ग्राहकों की बड़ी भीड़ लगी रहती है सारा दिन. सड़कों और दूकानों के बाहर खूब लाइट लगाकर रोशनी की जाती है, मंदिरों में भी भक्तों के द्वारा खूब प्रार्थना, पूजा और नाच-गाना होता है. लोग घरों को साफ-सुथरा करके सजाते हैं, अपने घरों के आगे अपने हाथों से रंगोली बनाते हैं..जो चावल और आटे से बनाई जाती है..बीच में उसके कमल का फूल भी बनाते हैं जो लक्ष्मी जी का चिन्ह है, ताकि माँ लक्ष्मी जो समृद्धि व धन की देवी हैं, घर में प्रवेश कर सकें. मंदिरों में इनकी मूर्ति के चार हाथों में से दो में कमल के फूल होते हैं जो पावनता का प्रतीक हैं. तीसरे हाथ से वरदान देती हैं और चौथे हाथ में से सिक्के गिरते हुये दिखायी देते हैं...जो धन का प्रतीक हैं. शाम के समय सब लोग तैयार होते हैं और अपने-अपने घरों में परिवारीजन मिलकर गणेश और लक्ष्मी की पूजा करते हैं. दिये जलाते हैं और घर बाहर व छतों को उनसे सजाते हैं. फिर मिठाइयाँ व अन्य पकवान आदि खाते हैं. आपस में अपनी हैसियत के हिसाब से लोग कपड़ों, गहनों, पैसों व मिठाइयों आदि का उपहार के रूप में आदान-प्रदान करते हैं.

व्यापारियों के लिये आज से नये आर्थिक वर्ष का आरंभ होता है, तमाम लोग ज्योतिषियों से अपने भविष्य के बारे में पूछते हैं. और इस दिन सब लोग लड़ाई-झगड़ों को भूल-भाल कर आपस में एकता कायम करने की कोशिश करते हैं. तो ये रही दिवाली पर कहानी..कैसी लगी इसे बताना ना भूलना. और अब आप सब लोग भी दिवाली की तैयारी में जुट जाइये या शायद पहले से ही जुटे होंगे. और खूब हँसी-खुशी व धमाके से मनाइये..अरे हाँ, धमाके से याद आया कि अगर आप लोग फुलझड़ी आदि जलाकर धमाका करना चाहते हैं तो बड़ों की देख-रेख में करियेगा व बहुत सावधानी बरतियेगा..तो अब चलती हूँ..आप सभी को मेरा प्यार व ढेरों शुभकामनायें..ये पर्व सभी को मंगलमय हो.

Friday, 24 September 2010

परीक्षा के दिन

प्यारे बच्चो,

जब भी आप लोगों की स्कूल में परीक्षाये होती होंगी तो उम्मीद है कि आप सभी लोग खूब मन लगाकर पढ़ाई भी करते होंगे. पर्चे देने के तुरंत बाद अगले पर्चे की तैयारी में जुट जाते होंगे. शिक्षाकाल हमारे जीवन में बहुत महत्व रखता है. जीवन में यही समय ही तो होता है मेहनत करके अपना आने वाला भविष्य सुखमय और उज्जवल बनाने का. यदि खूब मन लगाकर परीक्षा दें तो मेहनत जरूर सफल होती है. अपने में आत्म बिश्वास रखिये तो अच्छे अंक लेकर उतीर्ण होंगे. आपकी दिनचर्या का क्या हाल रहता है ? मेरे ख्याल से उन दिनों आप लोग इम्तहान की वजह से सुबह जल्दी उठते होंगें. और फिर तैयार होकर पेपर देने जाते होंगें. मन में कुछ घबराहट सी भी लगती है अधिकतर लोगों को परीक्षा के दिनों में चिंता के मारे..मुझे भी लगा करती थी. किन्तु आप लोग अपने मन को शांत रखें और लगन से पढ़ाई करें घर पर. और बीच में थक जाने पर कुछ आराम कर लें तो दिमाग में ताजगी आ जाती है. खाने में भी अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखें..मानसिक ताकत के लिये आप लोग रोज दूध, मेवा व फल भी लें. समय पर सुबह उठ कर तैयार हों और नाश्ता आदि करके निकलें घर से आप लोग और शांत मन से पेपर दें. घबराने की कोई जरूरत नहीं. और परीक्षा देने जाते समय अपने बड़ों का आशीर्वाद जरूर लें. मुझे पता है कि आप सभी तन-मन से डटकर अब पढ़ेंगे और अच्छा परिणाम पायेंगे. मेरी तरफ से आप सबको तमाम शुभकामनायें.

शिक्षक और शिष्य

बच्चों, आओ आज सबसे पहले हम उस महान शिक्षक व नेता की याद में कुछ पलों को मनन करें और सर झुका कर उन्हें नमन करें जिनकी जीवन-गाथा और सीखों से आज भी देश के तमाम शिक्षकों व विद्यार्थिओं को प्रेरणा मिलती है और जिनका जन्म-दिवस ही हर साल 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है..ऐसी ही उनकी मनोकामना थी. तो जैसा की आप सबको पता ही होगा की उनका नाम है..राधा कृष्णन. हाँ, बच्चों, टीचर ही हमें शिक्षा देते हुये जीवन में सही मार्ग दर्शन कराता है. उनकी दी हुई तमाम सीखें और बातें हमें सदैव याद आती हैं और जीवन में कई बार उनसे आगे बढ़ने में प्रेरणा मिलती है. और शिक्षक का कर्तव्य है की बच्चों को सही मार्ग-दर्शन करायें. बच्चे एक छोटे से बीज के समान होते हैं यदि बीज को ठीक से मिटटी में न जमाया जाय और सिंचाई न की जाय व खाद न दी जाय तो वह ठीक से अंकुरित और विकसित नहीं हो पाते हैं. उसी प्रकार यदि बचपन की प्रारंभिक शिक्षा के दौरान यदि शिक्षक के द्वारा ठीक से शिक्षा ना मिली या विद्यार्थी ही आलसी और कामचोर निकला तो वह आने वाले भविष्य में अपने जीवन में मजबूती से कदम रखने में असमर्थ होगा. कई बार हमें स्वयं अपनी छिपी हुई प्रतिभा के बारे में नहीं पता होता है किन्तु शिक्षक के प्रोत्साहन से वह श्रोत खुद व खुद वह चलता है. शिक्षक और शिष्य का स्कूल में शिक्षा के दौरान आपस में वही सम्बन्ध होता है जो एक बच्चे का घर के जीवन में माता-पिता के साथ. शिक्षक की महानता होती है की बिना भेद भाव किये हुये सभी शिष्यों को समान रूप से ज्ञान की बातें बताना, उनपर समान रूप से दृष्टि रखना और शिक्षा के स्तर को बनाये रखना. मेरा जन्म-स्थल एक छोटी सी जगह थी जो अब काफी विकसित हो गयी है. लेकिन जगह और स्कूल चाहें छोटे हों पर शिक्षक के महान बिचार और ज्ञान देने से कोई फर्क नहीं पड़ता. उसी प्रकार मेरे भी स्कूल में हर विषय के शिक्षक थे. हाँलाकि कंप्यूटर आदि के बारे में तब कोई नहीं जानता था. किन्तु मैं अपने सभी शिक्षकों का बहुत मान करती थी और हमेशा कहना मानने को तत्पर रहती थी. मैं बचपन से ही पता नहीं क्यों अनजाने में ही अन्याय के विरुद्ध बोलने लगती हूँ. कई बार सब टोक भी देते हैं इस बारे में. किसी का दुख भी नहीं वर्दाश्त होता मुझसे. मैं अपना होमवर्क हमेशा पूरा रखती थी जिससे टीचर खुश रहते थे.एक बार मेरी मुख्य-अध्यापिका बीमार पड़ गयीं जो मेरे घर के कुछ पास रहती थीं. तो मैं जाकर उनसे पूछकर उनके घर का काम कर देती थी और अक्सर जाकर उनके हाल पूछती थी. उनके कोई बच्चे नहीं थे और कोई देखभाल करने वाला भी न था..शादी भी नहीं करी थी उन्होंने. शिक्षक माता-पिता के समान ही तो होते हैं. यदि वह हर बच्चे का हित चाहते हैं तो हम क्यों नहीं उन्हें माता-पिता का दर्जा देकर उनकी मुसीबत में काम आ सकते हैं? आओ, हम सब आज अपने-अपने शिक्षकों के सम्मान में कुछ देर को नत मस्तक हों. वही हमारे जीवन की आधार शिला हैं.

कद्दू की कुछ बातें

आओ बच्चों, आज कुछ कद्दू के बारे में बात करें. इन दिनों सर्दी का मौसम आ रहा है और सब्जी-बाज़ार में कद्दुओं का आगमन भी शुरू हो रहा है. वैसे तो कद्दू को सब लोग अधिक पसंद नहीं करते हैं. जैसे की बिचारे चुकंदर की दशा निरीह हो जाती है वैसे ही इसे भी खाने में कुछ लोग संकोच करते हुये नाक-भौं चढ़ाते रहते हैं..खासतौर से बच्चे. तो आइये आज कुछ इसके बारे में बताऊँ और इसकी अच्छाइयों के बारे में भी तो शायद आप लोग इसके बारे में अपनी राय बदल दें.

कद्दू कई तरह के और कई रंग के होते हैं. छोटे-बड़े, लम्बे, हलके या भारी-भरकम भी. और यह कई रंगों में पाये जाते हैं. इनके रंग नारंगी और लाल ही नहीं बल्कि हरे, पीले और सफ़ेद भी होते हैं. इसकी तुलना घिया या तुरई के स्वाद से की जाती है. और अपने भारत में हर प्रांत में लोग इसे अलग नामों से जानते हैं..उत्तर प्रदेश में गंगाफल या सीताफल नाम से भी जाना जाता है.

अफ्रीका में कद्दू काफी छोटे और कई प्रकार के होते हैं. सुना जाता है की सबसे पहले कद्दुओं को मध्य अमेरिका में उगाया गया था. अमेरिका में इसको बहुत पसंद करते हैं और तरह-तरह से बना कर खाते हैं. और वहाँ पर कद्दुओं की पैदावार बहुत होती है. वहाँ के कुछ क्षेत्रों में कद्दुओं का उत्पादन अत्यधिक होता है. अमेरिका में 90% कद्दू की पैदावार तो वहां पर इलिनोइस नाम की एक जगह है वहाँ होती है. हर साल वहाँ कद्दू के सम्मान में तमाम शहरों में बहुत बड़ा उत्सव मनाया जाता है और मेला लगता है. और तमाम तरह से इसका खाने में इस्तेमाल किया जाता है. इंग्लैंड, अमेरिका, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया व कुछ अन्य देशों में भी ' हल्लोवीन ' नाम का दिवस अक्टूबर महीने की आखिरी तारीख को मनाते हैं जिसमें कद्दू को तराश कर उसे कभी लालटेन का आकार देकर उसके अन्दर मोमबत्ती जलाते हैं तो कभी उसे किसी भूत-प्रेत की शकल में तराशते हैं. कद्दू से कई प्रकार के केक, पाई, पुडिंग, सूप, बिस्किट आदि बनाते हैं. फिर वह लोग रिश्तेदारों व मित्रों को निमंत्रित करते हैं खाने पर, या पार्टी देते हैं. जाने-पहचाने लोगों में केक व पुडिंग बना कर भेजते हैं. और हाँ, इंग्लैंड व अमेरिका में कद्दू को पम्पकिन कहते हैं.

शताब्दियों पहले ग्रीक के लोगों ने कद्दू को ' पेपोन ' नाम दिया जिसका ग्रीक भाषा में मतलब होता है ' बड़ा खरबूजा '. फिर फ्रेंच लोगों ने इसे ' पोम्पोन ' नाम दिया और इंग्लैंड में ' पम्पिओन ' कहा. किन्तु जब शेक्सपिअर ने अपने उपन्यास ' मेर्री वाइव्स ऑफ़ विंडसर ' में इसका पम्पकिन नाम से जिक्र किया तब से सभी अंग्रेज व अमेरिकन इसे पम्पकिन कहने लगे. और बच्चों आप लोगों ने यदि ' सिंदरैला ' नाम की कहानी सुनी या पढ़ी है तो याद करिये कि उसमें एक बड़े कद्दू की शकल की बग्घी में ही सिंदरैला बैठ कर डांस-पार्टी में गयी थी. है ना?

अब कद्दू के बारे में कुछ विशेष बातें हैं जानकारी के लिये. जैसे कि:

1. इससे कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बन सकते हैं.

2. इसके बीजों में प्रोटीन और आयरन पाया जाता है और बीजों को भून व छील कर खाते हैं. और खाना बनाते समय भी बीजों का कई तरह से उपयोग किया जा सकता है.

3. इसके अन्दर के गूदे में विटामिन ए व पोटैसियम होता है.

4. इसके फूलों को भी खाया जा सकता है.

5. कद्दू को फलों की श्रेणी में रखा जाता है.

6. इसमें 90 % पानी होता है.

अपने भारत में कुछ लोग तो इसे बहुत प्रेम से खाते हैं. और जब इसका मौसम हो तो इसका भरपूर उपयोग किया जाना चाहिये.
उत्तर भारत में तो इसे कुछ खास पर्वों पर जरूर बनाया जाता है. जैसे की होली-दीवाली पर या फिर व्रत-उपवास के समय भी..सब्जी, हलवा या खीर के रूप में.

टर्की और बैल

आओ सबसे पहले आप सबको इस चिड़िया के बारे में बता दूँ. टर्की एक बड़ी और मोटी चिड़िया होती है जो जमीन पर ही चलती है और उड़ नहीं पाती. यह चिडिया इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि देशों में पायी जाती है. और 25 दिसम्बर को क्रिसमस के दिन वहाँ के लोग इसे पकाकर भी खाते हैं, ऐसा वहाँ के लोगों में रिवाज है. हमारे यहाँ भारत में होली - दीवाली पर हम लोग तरह-तरह के पकवानों के साथ पूरी कचौरी भी बनाते हैं वैसे ही वह लोग खाने में तरह-तरह की चीजें बनाते हैं पर उस दिन ख़ास तौर से खाने में टर्की की प्रमुखता रखी जाती है.

अब आप कहानी भी सुनिये:

एक बार एक टर्की टहलते हुये कहीं जा रही थी और जाते-जाते रास्ते में एक बैल को देखकर रुक गयी और उससे बातचीत करने लगी. और फिर बातों-बातों में एक पेड़ को देखकर बोली, '' मेरा मन बहुत करता है कि मैं इस पेड़ की सबसे ऊँची डाली पर जाकर बैठूँ, लेकिन मुझमें इतनी ताकत नहीं है कि मैं उड़ सकूँ.'' इसपर बैल बोला, '' मेरा कहना मानो तो तुम अगर मेरा चारा खाओ तो तुममें ताकत आ जायेगी, क्यों कि इसमें बहुत पौष्टिक तत्व हैं.'' टर्की ने कुछ सोचा और फिर कुछ चारा खाया और उसे कुछ ताकत महसूस हुई तो फिर वह पेड़ की नीचे वाली टहनी पर जाकर बैठ गयी. अगले दिन उसने थोड़ा और चारा खाया तो और ताकत आई और वह पिछली वाली टहनी से भी ऊँची एक टहनी पर जाकर बैठ गयी. इस तरह रोज-रोज चारा खाकर उसमें इतनी ताकत आ गयी की पंद्रह दिन बाद वह पेड़ की एक सबसे ऊँची शाखा पर जा बैठी. और ठाठ से वहाँ बैठ कर गर्वित होते हुये इधर-उधर देखने लगी. इतने में एक शिकारी उधर से अपने हाथ में एक बन्दूक लिये हुये गुजरा और तुंरत ही उसने टर्की पर गोली चला दी. टर्की छटपटाकर नीचे आ गिरी और मर गयी.

इस कहानी का अभिप्राय यह है बच्चों की किसी के कहने पर किसी तरह कहीं पहुँच भी गये तो कितनी देर टिक पाओगे वहाँ पर. इस बात पर भी गौर करना चाहिये. टर्की ऊपर पहुँच तो गयी पेड़ पर लेकिन शिकारी के हाथों से न बच सकी, है ना ?

चील और खरगोश

प्यारे बच्चों, आओ आज तुम्हे एक मजेदार छोटी कहानी सुनाती हूँ जिससे कुछ सबक भी सीखा जा सकता है.

एक दिन एक छोटा सा खरगोश कहीं जा रहा था. रास्ते में तमाम खेत पड़े तो वह उन खेतों में बड़ी बेफिक्री से उछलते-कूदते चलने लगा कि अचानक उसकी निगाह एक पेड़ पर बैठी हुई एक आलसी चील पर पड़ी जो वहाँ बैठ कर आराम कर रही थी. खरगोश वहीं रुक गया और उसने चील से पूछा, '' चील जी, आप वहाँ बैठी क्या कर रही हैं.'' तो चील ने उत्तर दिया, '' खरगोश भाई, मेरा मन आराम करने को किया तो मैं यहाँ ऊपर बैठ कर आराम कर रही हूँ, उड़ते-उड़ते बहुत थक गयी हूँ.'' खरगोश बोला, '' मैं भी बहुत थक गया हूँ लेकिन मैं आराम करने के लिये तुम्हारे पास इतने ऊपर नहीं पहुँच सकता क्या मैं यहाँ पेड़ के नीचे बैठ कर आराम कर सकता हूँ?'' चील ने कहा, '' हाँ, हाँ, क्यों नहीं, मुझे तो ऊपर बैठ कर आराम मिल रहा है पर तुम नीचे ही बैठ कर आराम कर लो.'' भोला-भाला खरगोश वहीं पेड़ के नीचे आँखें बंद करके लेट गया और जरा सी देर में ही उसे ठंडी हवा में नींद आ गयी. कुछ देर में एक लोमड़ी उधर से गुजरी और उस सोते हुये खरगोश को देखा तो उसे झपट्टा मार कर दबोच लिया और फटाफट खा गयी. बेचारा खरगोश!!

तो बच्चों इस कहानी से क्या मतलब निकाला आपने? चलो मैं ही बता देती हूँ..वह यह कि दूसरों की नकल करने के लिये उनसे सलाह माँगते समय स्वयं भी अपने बारे में सोचना चाहिये कि किसी की नक़ल करने का परिणाम गलत भी हो सकता है..जैसे की चील की सलाह पर खरगोश अपनी जान गँवा बैठा.

निरीह चिड़िया

एक बार बहुत ही वर्फीले और ठंडे मौसम में आँधी और तूफ़ान भी चल रहे थे. उसी समय सर्दी से बचने के लिये एक चिड़िया दक्छिण की तरफ उड़ रही थी. आँधी में फँसकर वह जमीन पर एक खेत में आ गिरी और बेहोश हो गयी. उसकी देह ठंड के कारण जम सी गयी. कुछ देर बाद वहाँ से एक गाय गुजरी और जहाँ चिड़िया पड़ी थी उसपर गोबर कर दिया, और फिर चली गयी. गोबर की गर्मी पाकर चिड़िया धीरे-धीरे होश में आने लगी और उसे महसूस हुआ की वह गरम बिछौने में लेटीहै और उसके शरीर में गर्मी आ रही है. लेकिन वह इस बात से अनजान थी कि वह गोबर की ढेरी के अन्दर पड़ी हुई है. गर्मी पाकर वह वहाँ इतनी खुश महसूस कर रही थी कि वहीं पर वह काफी देर आराम से पड़ी रही. और फिर अचानक ख़ुशी के मारे गाने लगी. इतने में एक बिल्ली पास से निकली और उसने चिड़िया के गाने की आवाज सुनी तो वह इधर-उधर खोजबीन करने लगी और जब गोबर की ढेरी में से आवाज़ आती सुनाई दी तो उसने गोबर को हटा कर देखा और वहाँ उसे चिड़िया दिखी. उसे देखते ही उसके मुँह में पानी आ गया और वह तुरंत उस चिड़िया को उठा कर उसे झट से खा गयी.
अब इस कहानी से तीन बातों की शिक्षा मिलती है:

1. यदि कोई अनजाने में तुम्हें नुकसान पहुंचाये तो वह इंसान तुम्हारा दुश्मन नहीं होता जैसे की गाय ने चिड़िया पर अनजाने में गोबर कर दिया था.

2. और यदि कोई तुम्हे कभी किसी मुसीबत से निकाले तो हर समय उससे अच्छाई की उम्मीद भी न रखो जैसे की बिल्ली ने निकाला तो चिड़िया को गोबर से किन्तु उसके इरादे कुछ और थे. क्योंकि वह उसे गोबर से निकाल कर खा गयी.

3. और कोई ऐसी मुसीबत की घड़ी हो जहाँ चुप रहने की जरूरत हो तो बच्चों, अपना मुँह बंद रखना चाहिये. यदि चिड़िया ने अपना मुँह बंद रखा होता तो वह बच गयी होती और थोड़ी देर में गोबर में से बाहर आकर उड़ गयी होती.