Monday, 5 December 2011

छुट्टी के दिन

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे वो

छुट्टी के दिन आते हैं

सैर-सपाटा करने को I

ना होमवर्क अब करना है

ना टीचर से अब डरना है

डांट नहीं खाने की दिक्कत

सजा नहीं कोई होगी अब

ना टीचर की सुननी बकबक

सब दूर रहेगा कुछ दिन को I

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे वो

छुट्टी के दिन आते हैं

सैर-सपाटा करने को l

दोस्तों संग जमकर घूमो

डिस्को में जाकर झूमो

पिक्चर को भी देखो जाकर

पॉपकार्न सब खाओ मिलकर

पार्टी, पिकनिक के दिन आये

पापा की पाकेट खाली हो I

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे वो

छुट्टी के दिन आते हैं

सैर-सपाटा करने को I

अब ना जल्दी उठने की झंझट

ना पाठ पढेंगे अब रट-रट

शोर-शराबा धमाचौकड़ी

गप्प-शप्प और चाट-पकौड़ी

उछल-कूद और धमाधम

जी भर कर मौज करो I

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे वो

छुट्टी के दिन आते हैं

सैर-सपाटा करने को I

पानी

पानी कितना अनमोल रतन
यह सबका है जीवन-धन
जो प्यासों की प्यास बुझाये
और सूखे पौधों को हर्षाये l

हो छोटा या बड़ा हो कोई
हो रंक कोई या शहंशाह
सभी ही इसकी कीमत जानें
पीकर हो जाते सब ताजा l

जीवन-मरण इसी में होता
इस पर निर्भर सारा संसार
इसकी मिलकर कदर करें हम
जब उपयोग करें हर बार l

जाति-पांति और धर्म भूलकर
हम हर दिन इसके गुन गाते
और डुबकी जो लेते गंगा में
वो मोक्ष सदा को पा जाते l

दूल्हा-घोड़ा

शादी का मौसम आया जब
तो एक दिन न्योता भी आया
मम्मी ने बिटिया को उस दिन
सुंदर से कपड़ों को पहनाया l

बिटिया के मन में था कौतूहल
शादी में जाकर वह देखेगी क्या
दूल्हा होती है क्या चीज़ और
क्या होता है यह शादी-ब्याह l

पहली बार जब उस दिन उसने
किसी की देखी जाती बारात
वह इतनी भोली-भाली सी थी
कि समझ ना पायी पूरी बात l

धूम-धड़ाके से बाराती निकले
और दूल्हे को घोड़े पर लादा
घोड़ा हांफे जाये और उस पर
दूल्हा बैठा जैसे हो शहजादा l

गाजा-बाजा शोर-शराबा पर
दिया ना उसने कोई ध्यान
लगातार ही देख रही थी वह
घोड़े को इतना होकर हैरान l

घोड़ा भी थोड़ा सजा हुआ था
दूल्हे का ढंका था पूरा चेहरा
कर ना पाई पहचान वह ढंग से
चेहरे पर पड़ा हुआ था सेहरा l

चकित हुई वह देख रही थी
दोस्तों के संग सारा हंगामा
भीड़-भाड़ में कहीं खो ना जाये
सोचके हाथ मम्मी का थामा l

पहुँच गयी जब बारात दूर बहुत
तब फिर होश में वह आई थोड़ा
मम्मी ने पूछा कैसा लगा दूल्हा
बेटी बोली 'अच्छा था दूल्हा-घोड़ा l

होली आई है

होली आई फिर से देखो
रंगों की भरमार है
खुशियों के फब्बारे छूटें
गलिओं में चीख-पुकार है l

आओ मन की जलधारा में
हम इन रंगों को घोलें
ऊँच-नीच का भेद भूल कर
आओ हम होली खेलें l

सुबह से लेकर शाम तक
रंगों से आँख मिचौली हो
घर बाहर लोग मिलें सब
आपस में हँसी-ठिठोली हो l

रंगों की पिचकारी भर-भर
डाल रहे एक दूजे पर
छत पर से भी फेंक रहे हैं
रंगों को सब के ऊपर l

ऐसे ही रंग भरें जीवन में
प्रेम भावना हम सब रखें
कष्ट न दें कभी किसी को
और ना हों फिर कोई दंगें l

मानवता और दया भावना
हो हर जन के ही मन में
खुशियाली छा जायेगी तब
सबके घर और आँगन में l

कपडे पहन के नये-नये
साथ में मिल गुझियाँ खायें
होली का आगमन हुआ है
आओ हम त्यौहार मनायें l

शरारत

माथे को अब पकड़े मुन्नी
कोई नई शरारत कर आई
सारा दिन स्कूल में रहती
घर पर आकर करे लड़ाई l

मम्मी-पापा और दादी की
डांट हमेशा है खाती रहती
घर में मचाके धमा-चौकड़ी
भाई से भी वो लड़ती रहती l

कोई गलती हो जाती है तो
भाई के मत्थे वह मढ़ देती
मम्मी अगर चपत लगाये तो
पापा से लिपट-लिपट रोती l